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आ जायें हम नज़र जो कोई

आ जायें हम नज़र जो कोई दम बहुत है याँ
मोहलत हमें बसाँ-ए-शरार कम बहुत है याँ

यक लहज़ा सीना कोबी से फ़ुरसत हमें नहीं
यानि कि दिल के जाने का मातम बहुत है याँ

हासिल है क्या सिवाये तरै के दहर में
उठ आस्माँ तले से के शबनम बहुत है याँ

माईल-ब-ग़ैर होना तुझ आबरू का ऐब है
थी ज़ोर ये कमां वाले ख़म-चम बाहर है याँ

हम रहरवाँ-ए-राह-ए-फ़ना देर रह चुके
वक़्फ़ा बसाँ-ए-सुबह् कोई दम बहुत है याँ

इस बूत-कदे में मानी का किस से करें सवाल
आदम नहीं है सूरत-ए-आदम बहुत है याँ

आलम में लोग मिलने की गों अब नहीं रहे
हर-चंद ऐसा वैसा तो आलम बहुत है याँ

वैसा चमन से सादा निकलता नहीं कोई
रंगीनी एक और ख़म-ओ-चम बहुत है याँ

अजाज़-ए-इसवी से नहीं बहस इश्क़ में
तेरी ही बात जान-ए-मुजस्सिम बहुत है याँ

मेरे हिलाक करने का ग़म है अबस तुम्हें
तुम शाद ज़िंदगानी करो ग़म बहुत है याँ

दिल मत लगा रुख-ए-अरक-आलूद यार से
आइने को उठा की ज़मीं नम बहुत है याँ

शायद के काम सुबह् तक अपना खिंचे न ‘मीर’
अहवाल आज शाम से दरहम बहुत है याँ

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Published inmir-ghazal

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