किसकी मस्जिद कैसे बुतखाने

किसकी मस्जिद कैसे बुतखाने कहाँ के शेख-औ-शाह
एक गरदिश में तेरी चश्म-ए-सियाह के सब खराब

मूँद रखना चश्म का हस्ती में आइना-ए-दीद है
कुछ नहीं आता है नज़र जब आँख खोले है हबाब

मत ढलक मिस्गाह-ए-तर से ऐ सरश्क-ए-आबदार
मुफ्त में जाती रहेगी तेरी मोती की सिका

कुछ नहीं बहरे जहां की मौज पर मत भूल ए ‘मीर’
दूर से दरिया नज़र आता है लेकिन है सराह

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